Economic Mirror {Industrial Ideology}


           आज का जो दौर है उसमें रुकना मना है आपकी एक भूल आपको महीनों कभी कभी वर्षो पीछे ले जा सकती है। पूरा जीवन एक दौड़ बन गया है किसी को भी वक्त नही की समय का दुरप्रयोग करें ये तो बात रही व्यक्ति विशेष की, यही हालात देशो के भी हैं हर एक देश दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में दूसरे को कुचलने में लगा है जो जितना आदर्शवादी दिखता है वो उतना ही अवसरवादी नज़रिया रखता है। कुछ तो इस राह में काफी आगे निकल चुके है और कुछ अभी प्रारंभिक अवस्था में है। मैं ये नही कहुगा की हम भारतीय उनमे से एक है। हमने काफी कुछ सीखा है पर कुछ हमसे काफी अलग और उम्दा सोचते है तो क्यों न उनसे कुछ सीखा जाए। अपना देश दुनिया का सबसे बड़ा युवा राष्ट्र बनने की कगार पर है और युवा सबसे बेहतर सोच और काम कर सकते हैं।
          आज हमें एक बड़े इंडस्ट्रियल रिफार्म की जरूरत है सबसे बड़ी जरूरत तो हमको अपनी मानसिकता को बदलने की है हम कहते तो बड़े गर्व से है कि Work is worship, पर अगर किसी डॉक्टर और इंजीनियर को सिक्योरिटी गार्ड या टैक्सी ड्राइवर का काम दे तो वो नही करेगा उसका ईगो उसको ये काम करने की इजाजत नही देता है। पर मैने कई विकसित देशों में देखा है कि ऐसा सामान्यतः होता है एक फुल टाइम जॉब के साथ लोग एडिशनल इनकम के लिए पार्ट टाइम जॉब में ऐसे काम करते है जिन कामो को हमारे देश मे हीन भावना से देखते है।
 इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि हमारे देश के इंडस्ट्रियल स्टैंडर्ड का न होना। हर एक कंपनी के रेटिंग की व्यवस्था की जानी चाहिए फिर उसके अनुसार उस कंपनी में काम करने वाले सभी वर्करों को एक समान वेतन (कुछ सर्वोच्च पदों पर 10-15% के अंतर को छोड़कर) मिलना चाहिए। अब आप इसमें मुझसे असहमत हो सकते है आप कहेगे की एक अनपढ़ या लेबर को मैनेजर या बड़े पदाधिकारी के समान वेतन क्यों, पर ये ही सबसे जरूरी हिस्सा है जनाब। पहला तो काम सभी करते है कोई शारीरिक तो को मानसिक को बुद्धि से तो कोई परिश्रम से, जिसके पास जो है वो उस प्रकार कार्य तो कर ही रह है ना। आप अपने अपर ग्रैड की अधिक सुविधा दे सकते है जिससे प्रोमोशन में लिए संघर्ष बना रहे पर कार्यक्षेत्र में समानता के लिए ये बहुत जरूरी है। और हाँ कम रेटिंग की कंपनी अपने एम्प्लॉई को कम वेतन और अधिक रेटिंग की कंपनी अपने एम्प्लॉई को अधिक वेतन दे सके। जिससे की कंपनियों में प्रतिस्पर्धा बनी रहे।
      इस व्यवस्था में भी एम्प्लॉईयो के बीच सुविधा और लीडरशिप को लेकर प्रतिस्पर्धा रहेगी। दुसरी तरफ कंपनियां अपने मैनपावर कॉस्ट को रेट बढ़ा कर पूरा कर सकती है क्योंकि जब लोगो की इनकम बढ़ेगी तो खरीद बजट भी तो बढेगा। आज के समय मे रोटी कपड़ा और मकान ही पर्याप्त नही है उन्नीसवीं सदी की सोच से आगे आने का समय है हम मनुष्य है रहने और खाने की व्यवस्था तो पशु भी कर लेते है हमे आज खाने, पहनने और रहने के अलावा मनोरंजन, संचार, यातायात, अतिथियों के स्वागत सत्कार के लिए भी व्यवस्था की पूर्ति करनी महत्वपूर्ण है। और ये सिर्फ कमर्शियल समानता से ही कि जा सकती है अधिक आय के लिए लोग पार्ट टाइम काम कर सकते है।



Powered by Blogger.