Brexit A New Wiodow for Economy


वर्ष 1992 में बिल क्लिंटन ने एक बहुचर्चित टिप्पणी की थी, इट इज द इकोनॉमी स्टुपिड। यानी सारा खेल अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। ब्रिटेन के मतदाताओं ने राजनेताओं को संकेत दिया कि वहां कोई अर्थव्यवस्था नहीं है और वास्तव में जहां राजनीति नहीं, वहां अर्थनीति नहीं है। बेशक ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने या नहीं रहने के फैसले पर हुए जनमत संग्रह में बहुत ज्यादा का अंतर नहीं था और मुकाबला बहुत करीबी था, लेकिन सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह था कि जनमत बेहद बहुवचनी था। दोनों राजनीतिक संगठनों टोरी एवं लेबर पार्टी के पूरे देशभर के मतदाताओं ने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के पक्ष में l
बीते करीब दो साल से चर्चा का विषय बना और कभी हां कभी ना के बीच आखिरकार ब्रिटेन में जनमत संग्रह हुआ और ब्रिटेन की जनता ने ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से बाहर करने के फैसले पर मुहर लगा दी। इससे पहले स्कॉटलैंड को ब्रिटेन से अलग करने को लेकर भी जनमत संग्रह हुआ था जिसमें स्कॉटलैंड ब्रिटेन से अलग-होते होते बच गया था लेकिन आवाज उठने लगी थी कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग होने को लेकर भी जनमत संग्रह होना चाहिए। आइए, आपको बताते हैं कि ये पूरा विवाद क्या है और क्या है यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन की कहानी? सबसे पहले हम आपको बताते हैं कि यूरोपीय यूनियन क्या है और ये कैसे बना?


क्या है यूरोपीय यूनियन और ये कैसे अस्तित्व में आया?

यूरोपियन यूनियन एक कस्टम्स यूनियन है जिसमें कानून है कि यूनियन के एरिया से बाहर के देशों से व्यापार के लिए कानून एक होगा। दरअसल दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के देशों की स्थिति बहुत खराब हो गई। उनके गुलाम देश भी आज़ाद होने लगे और उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ने लगी। इसी बीच अमेरिका, रूस और कई देशों ने मौका पाकर अपना व्यापार बढाना शुरू कर दिया। व्यापार में खुद को पिछड़ता देख 1956 में 6 यूरोपियन देशों फ्रांस (जो उस समय का पश्चिम जर्मनी था), इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्सेम्बर्ग के बीच ट्रिटी और रोम पैक्ट साइन हुआ।

इस समझौते के अंतर्गत यूरोपियन इकोोनॉमिक कम्यूनिटी बनाई गई। इस कम्यूूनिटी का मतलब यूरोप के देशों के लिए ‘कॉमन मार्केट’ यानी एक दूसरे के साथ व्यापार के लिए एक ही बाजार बनाना था जिससे आपस में सामान खरीद-बेच में कोई दिक्कत नहीं हो।

यूनियन में शामिल होने को लेकर ब्रिटेन में पहले से थे मतभेद

उस समय ब्रिटेन यूरोपियन देशों को यूरोपियन यूनियन में एक साथ होते देखता रहा लेकिन उसने यूरोपीय संघ का सदस्य बनने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई लेकिन पांच साल के अन्दर ब्रिटेन को समझ में आ गया कि उसका यूरोपीय यूनियन के साथ शामिल होने से ही फायदा है। उस समय ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी सत्ता में थी। प्रधानमंत्री हेरॉल्ड मैकमिलन ने यूरोपीय संघ में ब्रिटेन को शामिल करने की कोशिशें शुरू कर दी लेकिन विपक्षी लेबर पार्टी उनके इस फैसले का विरोध करने लगी। हेरॉल्ड विपक्ष को मनाने में ही जुटे थे कि फ्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल ने ब्रिटेन के प्रस्ताव को वीटो कर दिया और ब्रिटेन की यूरोपीय संघ में शामिल होने की उम्मीद पूरी तरह खत्म हो गई।

यूरोपीय यूनियन में शामिल होने के मुद्दे पर ही पहली बार ब्रिटेन में हुआ था जनमत संग्रह

इसके बाद साल 1973 में अगले कंजर्वेटिव पार्टी के प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ ने काफी प्रयासों के बाद ब्रिटेन की यूरोपियन यूनियन में शामिल करा दिया लेकिन 1974 में लेबर पार्टी सत्ता में आ गई और उसमें यूरोपीय यूनियन में रहने को लेकर दो गुट हो गए। एक गुट यूरोपीय यूनियन के साथ रहना चाहता था तो दूसरा यूनियन से बाहर निकलना चाहता था। इसी बात को लेकर पहली बार साल 1975 में ब्रिटेन के इतिहास में पहली बार किसी मुद्दे पर जनमत संग्रह कराया गया। इस जनमत संग्रह में जनता ने यूरोपीय यूनियन के साथ रहने को लेकर वोट दिया। लेकिन 1980 में लेबर पार्टी के कुछ नेताओं ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के नाम से नई पार्टी बना ली और विरोध करते रहे.

दूसरी तरफ यूरोपियन इकोनॉमिक कम्यूूनिटी भी बदली। पहले यूरोपियन कम्यूूनिटी और फिर यूरोपियन यूनियन बन गया और 6 देशों के सहयोग से बने इस संघ के आज 28 देश सदस्य हैं। रूस से अलग हुए यूक्रेन और इस्लामी देश टर्की भी यूरोपीय यूनियन में शामिल होने की कोशिश कर रही हैं।
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